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Lipid

वसा हमारे आहार का मुख्य घटक है और शरीर में अनेक कार्य करता है। इन्हें कार्बन, हाइड्रेजन और आक्सीजन का जैविक यौगिक कहा जाता है। ये कार्बोहाइड्रेट से भिन्न होते हैं, क्योंकि इनमें आक्सीजन का अनुपात बहुत कम होता है और कार्बन तथा आक्सीजन का अनुपात बहुत ज्यादा होता है। वसा का संघटन वसा अम्लों तथा गिलसरोल से होता है। इन वसात्मक अम्लों को संतृप्त और असंतृप्त रूप में वर्गीकृत किया जाता है। असंतृप्त वसाअम्ल कमरे के तापमान में तरल होते हैं। सामान्यत: वनस्पति तेलों में असंतृप्त वसा अम्लों का और पशु वसा में संतृप्त अम्लों का आधिक्य होता है।

वसा के दो प्रकार

दृश्य वसा व अदृश्य वसा। पशुजन्य स्रोत से मिलने वाली वसा जैसे मक्खन, घी व वनस्पति स्रोत से मिलने वाली वसा जैसे वनस्पति तेल (मूंगफली, सरसों इत्यादि का तेल) दृश्य वसा का उदाहरण है।
अदृश्य वसा सभी भोज्य पदार्थों में थोड़ी मात्रा में उपलब्ध रहती है। जैसे दाल, अनाज, सूखे मेवे, दूध, अण्डा, मांस इत्यादि। कुल वसा दृश्य वसा व अदृश्य वसा को मिलाकर बतार्इ जाती है और हमें आवश्यक वसा-अम्ल प्रदान करती है।

अनिवार्य वसा अम्ल

कुछ वसा अम्लों का आहार में होना अनिवार्य है, क्योंकि इन्हें शरीर में संश्लेषित नहीं किया जा सकता। ये बहु-असंतृप्त वसा अम्ल हैं, लिनोलेइक, लिनोलेनिक और अराकिडोनिक अम्ल, और इनका वर्गीकरण ''अनिवार्य वसा अम्ल के रूप में किया जाता है। चयापचय तथा त्वचा के सामान्य स्वास्थ्य के अनुरक्षण के लिए इनकी आवश्यकता होती है।
इसलिए समुचित प्रकार के वसा पदार्थ जिनमें अनिवार्य वसा अम्लों का आधिक्य हो, जैसे मूंगफली, बिनौला, मक्का और सूरजमुखी के तेल, हमारे आहार में अवश्य होनी चाहिए। पशु वसा में अनिवार्य वसा अम्ल बहुत कम होते हैं।
वास्तव में हमें केवल लिनोलेइक अम्ल की आवश्यकता पड़ती है, क्योंकि दूसरे दो अम्लों को शरीर में उसी से अर्थात लिनोलेइक अम्ल से ही संश्लेषित किया जा सकता है।

वसा के कार्य

वसा के कार्य निम्न प्रकार हैं -
1. शकितप्रदायक - वसा शकित का सांदि्रत स्रोत है। एक ग्राम वसा से 9 कैलोरी मिलती है। कारबोज की तुलना में इससे ऊर्जा ज्यादा मात्रा में ही नहीं मिलती, बल्कि तीव्र गति से भी मिलती है।
2. वसा प्रोटीन को बचाकर रखने का कार्य भी उसी प्रकार करता है, जैसे कार्बोहाइड्रेट करते हैं।
3. शरीर की आवश्यकताओं के लिए ऊर्जा का भंडारण - वास्तव में वसा उत्तकों में केवल वसा का भंडारण उसी रूप में नहीं होता, बलिक तत्काल उपयोग न किए गए ग्लूकोज और ऐमीनों अम्ल की कुछ मात्रा का भी शरीर में वसा के रूप में संश्लेषण और भंडारण किया जाता है। इसी से वसा उत्तकों के भंडार से ऊर्जा निरन्तर उपलब्ध होती रहती है।
4. रोधन और विस्तृति - वसा की अवस्त्वक परत एक प्रभावी रोधक है, और यह सर्दियों में शरीर के तापमान के क्षय को कम करती है। इस प्रकार यह शरीर के तापमान को नियमित करती हैं। शरीर के अंगों की वसा की भरार्इ से महत्त्वपूर्ण अंगों जैसे कि गुर्दों को किसी प्रकार की शारीरिक क्षति से रक्षा करने में भी इससे सहायता मिलती है।
5. आवश्यक वसा अम्लों का संभरण - वसा कुछ वसा अम्लों का स्रोत भी है जो चयापचय तथा सामान्य त्वचा के अनुरक्षण के लिए आवश्यक है।
6. वसा से शरीर में वसात्मक घुलनशील विटामिनों के अवशोषण और परिवहन में भी सहायता मिलती है।
7. वसा शरीर के विभिन्न अंगों के लिए विशेष रूप से पाचन संस्थान मार्ग के अंगों के लिए स्नेहक का भी कार्य करती है।
8. संतृपित मूल्यवत्ता - वसा अमाशय में हाइड्रोक्लोरिक अम्ल के स्राव को कम करती है। इससे आहार वहां ज्यादा देर तक रहता है और भूख की इच्छा में देर होती है।
9. वसा से आहार के स्वाद में भी वृद्धि होती है इससे पकाए गए भोजन में स्वाद बढ़ जाता है।

आहार वसा के दो स्रोत

1. पशु स्रोत - इसमें मक्खन, घी, चर्बी, संपूर्ण दूघ और इसके उत्पादन, मांस, मछली, मुर्गी और अण्डा समिमलित है।
2. वनस्पति स्रोत - इनमें वनस्पति तेल-मूंगफली, अदरक, सरसों, बिनौला, सूरजमुखी और गोले आदि के तेल समिमलित हैं। इनमें जमी हुर्इ वसा, कृत्रिम मक्खन, गिरी और काजू, अखरोट, मूंगफली, बादाम, अदरक और सरसों आदि तिलहनों के बीज भी सम्मिलित हैं।

प्रस्तावित दैनिक आहारीय आवश्यकता

वसा की आवश्यकता मनुष्य की ऊर्जा की आवश्यकता पर निर्भर होती है। शारीरिक दृषिटकोण से वसा अन्तर्ग्रहण में पर्याप्त भिन्नता हो सकती है, और फिर भी अच्छा स्वास्थ्य अनुरक्षित किया जा सकता है। सामान्यत: कुल ऊर्जा का 15-20 प्रतिशत वसा के द्वारा मिलना चाहिए।

कमी

कार्बोहाइड्रेट के अभाव की भांति ही, ऊर्जा आवश्यकताओं की तब तक संपूर्ति नहीं होगी, जब तक आहार में वसा पदार्थों की कमी है। इसी कारण भारन्यूनता, कमजोरी तथा कार्यक्षमता में कमी होती है। इसके अतिरिक्त घुलनशील वसा विटामिन और अनिवार्य वसा अम्लों में भी कमी आ जाएगी। इसकी कमी से त्वचा, आंख और हडिडयों से सम्बनिधत रोग होते हैं। वसा की कमी से आवश्यक वसाअम्ल की भी कमी हो जाती है। ये वसा अम्ल हमारे शरीर की अनेक चयापचयी गतिविधियों में सहायक होते हैं। इसकी कमी से त्वचा मोटी और खुरदरी हो जाती है तथा शरीर पर सुर्इ के आकार के दाने उभर जाते हैं।

अधिकता

यदि ज्यादा वसा का अन्तग्र्रहण किया जाएगा तो इससे मोटापा, पाचन संस्थान अव्यवस्था और मधुमेह तथा हृदय-रोगों की प्रवृत्ति में वृद्धि होगी। वसा की मात्रा अधिक लेने से रक्त में कोलेस्ट्रोल की मात्रा बढ़ जाती है। यह कोलेस्ट्रोल धीरे-धीरे रक्त धमनियों में जम जाता है। रक्त धमनियां संकरी हो जाती हैं और हृदय सम्बन्धी रोग होने का भय रहता है।

स्त्रोत: इंटरनेट, दैनिक समाचारपत्र

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